Wednesday, February 1, 2023

गीता के उपदेश

गीता के उपदेश वो परम सत्य हैं, जिसे जान कर हर व्यक्ति दुख से दूर और सुखी जीवन जी सकता है। इस लेख में गीता की 13 ऐसी बातें बताई गयी हैं, जिसकी जरूरत हर व्यक्ति को पड़ती है। मनुष्य का संघर्ष जितना बाहरी होता है, उतना ही आंतरिक भी चलता रहता है। सोच और कर्म का संतुलन ही सफल जीवन का मंत्र है। सही-गलत और उचित निर्णय की दुविधा में फंसे व्यक्ति को गीता के इन उपदेश से मानसिक मजबूती और धैर्य मिलता है। 
                 फोटो गूगल से लिया गया हैं 

1) विश्वास की ताकत 
तुम अपने विश्वासों की उपज हो। तुम जिस चीज में विश्वास करते हो, तुम वही बन जाते हो। जो स्वयं पर विश्वास करते हुए लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं, उन्हे सफलता जरूर मिलती है। अगर व्यक्ति अपने लक्ष्य के लिए कर्म में पूरे मन से लग जाता है और उसे कर्म करने से खुशी मिलती है तो सफलता उससे दूर नहीं।

2) मृत्यु से भय व्यर्थ है 
हर व्यक्ति के मन में मृत्यु का भय होता है। इस संसार का जब से निर्माण हुआ है, तब से जन्म-मृत्यु का चक्र चलता आ रहा है। यह प्रकृति का नियम है। इस सत्य को स्वीकार करके भयमुक्त होकर आज में जीना चाहिए। किसी को भी आने वाले पल के बारे में कुछ नहीं पता होता लेकिन इस संशय में भयभीत रहने से जीवन नहीं जिया जा सकता। लेकिन जो व्यक्ति गीता और सिद्धांत को जनता हैं वही कभी भी भयभीत नहि होता।

3) कर्म करना ही हैं 
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि व्यक्ति कर्म करने के लिए ही पैदा हुआ है और बिना कर्म किये कोई रह नहीं सकता। फल की चिंता करना व्यर्थ है क्योंकि इससे मनुष्य का मन काम से भटकने लगता है। किसी कर्म से सफलता नहीं मिलती तो क्या हुआ, असफलता भी ज्ञान के द्वार खोलती है।
अगर बिना फल की चिंता किये कर्म करते रहोगे तो सफलता और मन की शांति जीवन भर तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगी। जो कर्मफल से विरक्त होकर कर्म करता जाता है, उसका आध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता जाता है। और वह एक न एक दिन सफल व्यक्ति ही नहि बल्की सफल लीडर बन जाता हैं। लोगो के लिया एक सफलता का उदाहरण बन जाता हैं।

4) स्वार्थ न बने 
जो व्यक्ति हमेशा स्वार्थ प्रेरित होकर फल की चिंता करते हुए कर्म करते हैं और सिर्फ फल ही उन्हे कर्म करने को प्रेरित करता है, ऐसे लोग दुखी और बेचैन रहते हैं क्योंकि उनका दिमाग हमेशा इसी उलझन में फंसा रहता है कि उन्हे क्या फल मिलेगा। स्वार्थी व्यक्ति सुखी नहीं रह पाता और ऐसे व्यक्ति से कोई भी संबंध नहीं बनाना चाहता। इसलिए स्वार्थ से ऊपर उठें और दूसरों का हित के लिया भी सोचे, क्योंकि स्वार्थी व्यक्ति कभी लोगो के साथ अपने आप को कनेक्ट नहि कर सकता, और स्वार्थ के करण अन्य पाप भी करने को मजबूर हो जाता हैं।
5) क्रोध एक अग्नि के समान जो सबकुछ जलाकर खाक कर देगी 
क्रोध या गुस्सा करना व्यक्ति के दिमाग को पूरी तरह डिस्टर्ब कर देता है। जिससे मन का स्वभाव चीड़ चीड़ हो जाता हैं। और क्रोध के आवेश में विवेकहीन होकर कई बार व्यक्ति अपना ही नुकसान कर बैठता है, या फिर अपनी ही मानसिक शांति को भंग करके खुद को कष्ट देता है। क्रोध की अग्नि में बुद्धि और तर्क नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति बिना विचार किए बस अपने अहम (Ego) की तुष्टि करने वाले काम करता है। गुस्सा व्यक्ति की विचार शक्ति को पंगु बना देता है और भ्रम पैदा करता है। गुस्सा ही है जिसके करने से न जाने कितने ही परिवार नष्ट हो गए, क्रोध अग्नि के समान सभी कुछ जला देती हैं।

6) मन पर कंट्रोल जरूरी क्यों है 
मन का स्वभाव है कि ये आसानी से भटक जाता है। गीता में भगवान ने मन को हठी और चंचल स्वभाव का बताया हैं।अगर जीवन को सफलता की दिशा में ले जाना है तो मन को काबू करना बहुत जरूरी है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि बार-बार प्रयास करने से धीरे-धीरे चंचल मन को वश में किया जा सकता है। मन को वश में करने से दिमाग की बढ़ जाती है और आत्मविश्वास और अधिक हो जाता हैं जिससे कार्यों में सफलता मिलने लगती है। अगर मन को वश में नहीं करोगे तो ये आपका सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। और शत्रु यदि मन ही हैं तो इसका तोड़ और इसके ऊपर काबू पाना अत्यंत कठिन हो जाता हैं। एकमात्र उपाय सिर्फ पवित्र मंत्र के प्रहार मात्र से इसे नियंत्रित किया जा सकता हैं।

7) भगवानों में कोई भेद भाव नहि 
इस संसार में भगवान कई रूपों में जाना जाता है। कोई इसे भगवान कहता है तो कोई अन्य नाम से पुकारता है लेकिन इनकी शक्ति बड़ा-छोटा नहीं होती है, समय और काल के प्रभाव से भगवान का हर रूप समान और दुखो को हरानेवाला हैं जैसे हर नदी अंत में सागर में जाकर मिलती है, वैसे ही हर धर्म, मत और संप्रदाय की धारायें परमात्मा रूपी समुद्र में समा जाती हैं। यह संसार परमपिता का ही स्वरूप है, वो हर कण में विद्यमान है। जिसने जिस जिस भाव से जानने की कोशिश की भगवान ने भी वैसे ही दर्शन diya, चाहे उनको पाने वाला राजा अंबारिश हो या सबरी।

8) कर्तव्य पालन जरूरी है |
भगवान श्रीकृष्ण उपदेश देते हैं कि हर व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। यही धर्म है। अगर अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया जाता है तो मन में अशान्ति और दुख प्राप्त होता है। अपनी पसंद-नापसंद, मोह-बैर को किनारे रखकर अपना कर्तव्य के साथ धर्म को जानने का भी समय दो। किसी अन्य व्यक्ति का कर्म आपको कितना भी आकर्षित करे, उसके प्रलोभन में न आयें। कष्ट में रहते हुए भी अपना कर्म करना दूसरे की नकल करने से श्रेष्ठ है। भगवन के बताए नियम में रहकर कर्म करना अधिक श्रेष्ठ हैं जिससे जीवन में शांति, संतुष्टि मिलती है।
भक्ति भजन ध्यान जप तप करने से परमात्मा को अनुभव किया जा सकता है ।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि शारीरिक कर्म से ज्ञान का मार्ग उच्च है और ज्ञान मार्ग से भी ऊपर ध्यान मार्ग है। ध्यान मार्ग पर बढ़ने से ईश्वर को अनुभव किया जा सकता है। और भक्ति मार्ग सर्व साधारण और सभी जन के लिया आसान भी है और भगवन का sakchat अनुभव किया जा सकता है। जैसे की तुकाराम महाराज, ध्रुव महाराज,
 जो व्यक्ति मन और इंद्रियों को शांत करके, पूर्ण विश्वास से अपना ध्यान भगवान में लगाता है, उसे ईश्वर का ज्ञान और अस्तित्व अवश्य अनुभव होता है।जो हर जगह, हर जीव-मनुष्य में ईश्वर को देखता है, सबके हित में लगा रहता है, उसपर परमपिता अवश्य कृपा करते हैं। ज्ञान मार्ग हो या भक्ति मार्ग, समर्पण-प्रेम-विश्वास ही आपको ईश्वर के प्रकाश की ओर ले जाता है। भगवान की पूजा बहुत से लोग करते हैं लेकिन उनको शांति क्यों नहीं मिलती। क्योंकि भगवान आपके हृदय में निवास करता है, उसे पता है कि आपका भाव क्या है।


9) अधिक शक करने वाला कभी खुश नहीं रह सकता 
श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि संशय (शक) करने वाले का विनाश हो जाता है, इसलिए संदेह करने से बचें। अधिक संदेह करने से मन की शांति भंग हो जाती और व्यक्ति भ्रमित होकर अपने संबंधों को नष्ट कर डालता है। जिसे शक करने की आदत पड़ जाती है, उसे इस लोक या परलोक में भी शांति नहीं मिलती। सत्य की खोज ठीक है लेकिन बिना सच जाने, कल्पनावश होकर संदेह करने का अंत दुख-क्लेश-पश्चाताप के रूप में होता है। और सक शंका का कोई इलाज भी नहि हैं इसीलिए शंका नहि करनी चाहिए।

10) अति करने से बचें 
जीवन में संतुलन बहुत जरूरी है। किसी भी चीज की अति करना अच्छा नहीं है। जैसे सुख आने पर प्रमाद करना और दुख आने पर निराशा में डूबे रहना, दोनों ही गलत है। असंतुलन जीवन की गति और दिशा को बाधित करता है, जिससे अनावश्यक कष्ट और दुखों का जन्म होता है। जिसके मन, विचार और कर्म में संतुलन है, उसे ज्ञान मिल जाता है और ज्ञान से ही सदा के लिए शांति, संतुष्टि मिलती है।

11) सही कर्म से भक्ति, ज्ञान से मुक्ति संभव है 
गीता के उपदेशों में कर्मयोग का सिद्धांत कहता है कि संसार से विरक्त होना ही मुक्ति का उपाय नहीं है। संसार में रहकर एक गृहस्थ अपने कर्मों का पालन करते हुए, कर्मफल से विरक्त होकर मुक्ति प्राप्त कर सकता है। सही विचार और उचित कर्म भी आसक्ति को खत्म करने में सक्षम है। अच्छे कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते, चाहे ये दुनिया हो या परलोक। कर्मो का प्रभाव कई जन्म तक चलता है इसीलिए कर्म भी धार्मिक करे जिससे कर्म का फल भक्तिमय हो।

12) अधिक इच्छा दुखों का मूल है 
इस संसार में जितनी भी चीजें सांसारिक सुख की श्रेणी में आती हैं, उनकी एक शुरुआत और अंत जरूर होता है। इन सांसारिक सुखों का अंत दुख, कष्ट और दुर्गति के रूप में होता है। इच्छाओं का अंत नहीं है, एक पूरी होती है तो दूसरी नई इच्छा आ जाती है। हर इच्छा से प्रेरित होकर कर्म करना गलत है क्योंकि ऐसे तो अनुचित कार्य भी होंगे। इच्छाओं से विचलित न हो, उन्हे एक विरक्त दर्शक बनकर देखो और वे चली जायेंगी। जो हमारे पास हैं समय ने हमे हमारी छमताओ के अनुसार ही रखा हैं। इसीलिए इच्छा का अंत नहि है भले शरीर का अंत हो जाए।

13) भगवान ही सबसे बड़ा सहारा है 
परमपिता ही एकमात्र हमारे आधार है और अपने हैं। इस संसार में कोई भी अकेला नहीं है। ईश्वर में विश्वास रखते हुए जो मनुष्य भक्ति पथ या कर्मपथ पर बढ़ता जाता है वो सदा शांति, सुख और मुक्ति पाता है। भूत और भविष्य की चिंता करना व्यर्थ है, वर्तमान ही सत्य है। जो भी पूर्ण समर्पण से ईश्वर की शरण में आता है, परमात्मा उसका कल्याण अवश्य करते हैं।
क्योंकि कृष्ण ने कहा हैं मेरे शब्द व्यर्थ नहि हैं।
               फोटो गुगल से लिया गया हैं 

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